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Wednesday, 25 April 2012

क्या कहता कबीरा इस पर...


समझ कर भी ना-समझ है हम!

चाहता तो है मन...
बहुत कुछ कहना!
बिती बातों को....
बार बार दोहराना....
किसी से कुछ ले कर...
किसी को कुछ देना!

पर ये हुई सिर्फ....
अपने मन की बात....
किसी के मन में क्या समाया....
मेरी तरह ही...
हर कोई है अज्ञात!
गलतफहमियां अनगिनत....
जिनकी नहीं कोई औकात...
फिर भी उन्हें दिल से निकालना...
है सभी के लिए....बहुत बड़ी बात!

प्रेम रस से है भरपूर...
हर दिल का...हर कोना...
इस बात को समझता है...
हर कोई सयाना...
पर हर किसी पर उसे लुटाना...
चाहेगा क्या कोई दीवाना?

प्रेम की गंगा बहाने की बातें...
किताबों में रह गई है दब कर...
साधु-महात्माओं के....
प्रवचनों में सुनाई देती है अक्सर!
...पर सुन कर अनसुना करने की आदत....
जोर मार रही है हमारे अंदर....

...प्यारे है हमें झगड़े और क्लेश-कलह.....
नफरत और बदले की भावना!
कटु शब्दों की गर्म बौछारें.....
बड़ा ही अच्छा लगता है हमें....
मित्रों का पल भर में शत्रु बन जाना!

कुछ कहने पर....
देखा है हमने ऐसे सिर-फिरों को...
'मै ऐसा ही हूँ!' कहकर मुस्कुरातें हुए ...,
अपने अख्खडपन पर गर्व करतें हुए ,
बड़े ठाठ से इधर-उधर इतरातें हुए ! 
 
क्या कृष्ण....क्या राम...
क्या हर हर भोले...
क्या जय श्री भगवान!
नजर आ रहा है हर कोई....
'नाम' दिन-रात इन्हीका जपता...
क्या कहता कबीरा इस पर....
काश!...कि आज वह ज़िंदा होता!

नोट...यह हमारे समाज की छबी है!...इसे कृपया व्यक्तिगत ना लिया जाए!


उपन्यास के उन्नीसवे पन्ने का लिंक दिया जा रहा है!


http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/mujhekuchhkehnahai/entry/19-%E0%A4%95-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%9C-%E0%A4%AC%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%88-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%A8-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8-%E0%A4%AF-%E0%A4%B8

20 comments:

रविकर फैजाबादी said...

बहुत सुन्दर भाव --

आभार दीदी ।।

गस्त कबीरा मारता, अक्खड़ ढूंढे खूब ।
कोठे पर पाया पड़ा, रहा सुरा में डूब ।

रहा सुरा में डूब, चरण-चुम्बन कर चहके ।
अपनों को अपशब्द, गालियाँ देकर बहके ।

यह अक्खड़पन व्यर्थ, स्वार्थी सोच बताता ।
फँसा झूठ में जाय, तोड़ के सच्चा नाता ।।

Kailash Sharma said...

बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति...

क्षितिजा .... said...

सच उजागर करती सटीक रचना ..

वन्दना said...

bilkul sahi kaha

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात है!! बहुत सुन्दर
इसे देखें-
फेरकर चल दिये मुँह, था वो बेख़ता यारों!
आईना अब भी देखता है रास्ता यारों!!

udaya veer singh said...

क्या बात है!! बहुत सुन्दर

Amrita Tanmay said...
This comment has been removed by the author.
Amrita Tanmay said...

बहुत भावपूर्ण रचना...

रविकर फैजाबादी said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति |
शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ||

सादर

charchamanch.blogspot.com

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट कल 26/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 861:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

ZEAL said...

very true..

सदा said...

बहुत सही कहा है आपने ...

kase kahun?by kavita verma said...

sach kaha.aur sunder likha

Dr.R.Ramkumar said...

Bahut sunder kavita !
Badhaiyannnn!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...!

अनामिका की सदायें ...... said...

waah bahut sunder sandesh deti rachna.

Dr. Ayaz Ahmad said...

प्रेम की गंगा बहाने की बातें...
किताबों में रह गई है दब कर...
साधु-महात्माओं के....
प्रवचनों में सुनाई देती है अक्सर!

sahi bat kahi he.

Saras said...

कितना सच कहा है आपने ..दरअसल मनों में बढ़ता अविश्वास इसकी बहुत बड़ी वजह है ....हर आदमी दूसरे की तरफ पीठ करने से डरता है ...और इसीलिए यह भाई चारा..यह प्यार ..कई कई मौतें मरता है

Minakshi Pant said...

सच्चाई को उजागर करती खूबसूरत रचना |

वन्दना said...

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति.