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Sunday, 22 August 2010

कविता के दिल का दर्द!

कविता भी बहाती है आंसू!












उस दिन नदी किनारे...
एक पत्थर पर बैठी हुई ...
एक अकेली कविता...
आंखों से बह रहे थे ....
बड़े बड़े मोतियों जैसे आंसू!
झर-झर बहते जा रहे थे...

नदी की बहती धारामें...
समाकर बढ़ रहे थे आगे आगे...
वहां मेरी उपस्थिति...
महसूस की कविताने...
पूछा कैसे हुआ आना यहाँ...
मैं तुम्हे खोजती हुई...
आई हूँ यहाँ...

कविता!...तुम्हारी जरुरत...
कवियों को है....
किताबों को है...
पाठकों को है....
गायकों को है...
संगीतकारों को है.....
श्रोताओं को है...
सभी महफ़िल सजाएं बैठे है....
और तुम यहाँ, इस कदर ...
उदास, खामोश और
आंसू बहाती हुई...

हां! ..मुझे छोड़ दो....
अकेले कुछ देर के लिए....
बहाने दो आंसू...
दिल सब का बहलाती हूँ...
दिल मेरा भी है....
दर्द मैं भी करती हूँ महसूस....
मन में मेरे भी उठती है तरंगे...
मन मेरा भी है!

..और तभी महसूस किया मैंने...
दिल, मन और आत्मा ....
कविता की भी होती है....
हम जाने अनजाने कविता पर....
करते है अत्याचार....
तब आत्मा घायल...
कविता की भी होती है!



15 comments:

संगीता पुरी said...

दिल, मन और आत्मा ....
कविता के भी होते है....
हम जाने अनजाने कविता पर....
करते है अत्याचार....
तब आत्मा घायल...
कविता की भी होती है!

बहुत खूब !!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कविता जी. धन्यवाद

वन्दना said...

अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (23/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।

shikha varshney said...

Bahut achha likha hai ..vakai kavit ka dard ubhar aaya .

वन्दना said...

अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (23/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

ताऊ रामपुरिया said...

हम जाने अनजाने कविता पर....
करते है अत्याचार....
तब आत्मा घायल...
कविता की भी होती है!

बहुत ही सशक्त बात कही आपने, बहुत मार्मिक शब्द विन्यास, शुभकामनाएं.

रामराम.

अजय कुमार said...

कविता पर अत्याचार ??? क्या बात है । नही होनी चाहिये ।

अनामिका की सदायें ...... said...

हां! ..मुझे छोड़ दो....
अकेले कुछ देर के लिए....
बहाने दो आंसू...
दिल सब का बहलाती हूँ...
दिल मेरा भी है....
दर्द मैं भी करती हूँ महसूस....
मन में मेरे भी उठती है तरंगे...
मन मेरा भी है!

काश कविता समझ पाती की उसको समझने वाली ही तो उसके पास थी वर्ना आजकल के इस दौर में लोग अपने रिश्तों को भी भूल जाते हैं...समझने की कोशिश समझ कर भी नहीं करते तो वहाँ उस कविता को इतना मान दिया जा रहा है...तो कविता को मान जाना चाहिए न.

एक कवी मन ही कविता के दर्द को समझ सकता है.

सुंदर प्रस्तुति .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाह ....कविता की भावनाओं को महसूस करने वाला दिल कितना संवेदनशील होगा ...मैं यही सोच रही हूँ ...खूबसूरत अभिव्यक्ति ..

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

संजय भास्कर said...

बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

dimple said...

hmm sahi kha aapne kavita bhi aansu bahaati hai..jab dukhti hai uski atma...

mridula pradhan said...

bahut sunder.

रश्मि प्रभा... said...

kavita bhi ghayal hoti hai ...bahut hi bhawpurn rachna

apni yah rachna vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per parichay tasweer blog link ke saath

http://urvija.parikalpnaa.com/

आशा जोगळेकर said...

आह , कविता का दर्द झर झर बह रहा है आंसूओं में बहता जा रहा है ।

बहुत सुंदर अलग सी कविता ।