Monday, 10 December 2012
हिन्दी ही में बात करों!
हिन्दी ही में बात करों!
तुम ‘’हाउ आर यू...’क्यों बोल रहे,जरा वतन को याद करों...
तुम हो भारत-मां की संतान...हिन्दी ही में बात करो!
तुम्हे प्यारी है अपनी माता,उसे ‘मां’ कह कर ही पुकारों...
काहे को कहते हो मदर,उसे ‘मोम’ भी काहे पुकारों...
समझों अपनी जिम्मेदारी....भाषा पर अपनी ‘गर्व’ करो...
तुम हो भारत-मां की संतान....हिन्दी ही में बात करों!
जरा विदेशियों को देखो....उन्हें अपनी भाषा प्यारी....
क्या प्रयोग में लातें है...वे गलती से भाषा हमारी...?
फिर तुम इंगलिशके क्यों दीवाने....थोडीसी ही शर्म करो...
तुम हो भारत-मां की संतान...हिन्दी ही में बात करों!
भाषाएँ अच्छी है सभी...आज करतें है हम स्वीकार....
पर हिन्दी हो सबसे उपर....आओ हम दिलवाएं उसे ये अधिकार....
ये प्रण ले लों..जब बतियाओ...या पढ़-लिखने का काम करो....
तुम हो भारत-मां की संतान....हिन्दी ही में बात करों!
हिन्दी में लिखों तुम कविताएँ,लिखों हिन्दी में लेख-कहानियां....
हिन्दी जैसी सुमधुर भाषा से...परिचित तो हो, सारी दुनिया....
नेक काम तुम करतें हो अनेकों...अब बस नेक ये काम करों...
तुम हो भारत-मां की संतान..हिन्दी ही में बात करों!
Posted by Aruna Kapoor at 12/10/2012 02:18:00 pm 3 comments
कविता आजकल...(हास्य कविता)
कविता आजकल...(हास्य कविता)
कविता आजकल....
नहीं रही प्रॉपर्टी...
जन्म-जात कविओं की....
नहीं रही सगी-सबंधी...
मनन-चिंतन में डूबे,दु:खी आत्माओं की....
नहीं रही लाडली....
मस्तमौला, प्रेमी, रसियाओं की...
नहीं रही शान....
शूर वीरों की गाथा सुनाने वालों की....
नहीं रही प्रणय में असफल...
लैला-मजनू, हीर-रांझों की....
कविता आजकल....
लिख रहा है ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा...
कविता लिखने के लिए...
बिन-जरूरी है जन्म-जात कवि होना!
जेब में हो नोटों के बंडल...
जो कुछ लिखों कविता ही है...
किसी और से लिखवाकर....
अपने नाम पर प्रकाशित करवा लों..
कविता आखिर, कविता ही तो है...
वैसे लिखनी हो गई है बहुत आसान...
छपनी तो हो गई है....
उससे भी बहुत आसान....
ना कहीं प्रेषित करने का झंझट...
ना खेद सहित वापसी का खेद...
‘ओंन लाइन’’ प्रकाशित खुद ही करों...
मित्रों को जबरदस्ती पढ्वावों...
मित्र भी लिखतें है कविता....
वे आपकी ‘लाइक’ करतें है...
आप भी उनकी ‘लाइक’ करों!
जो कुछ आपने लिखा है....
ढाला है, शब्दों की कतार में ....
उसकी किताब भी छपवाओं बेशक...
प्रकाशकों की दुकान खुली है....
आप ही के इंतज़ार में....
तो कविता आजकल...
बहुत सस्ती मिल रही है महंगाई के जमाने में...
खूब करो पठन-पाठन...
कवियित्री ‘अरुणा’ कह रही...क्या हर्ज है हँसने-हंसाने में..
Posted by Aruna Kapoor at 12/10/2012 02:15:00 pm 1 comments
रेगिस्तान की मरुभूमि में..
रेगिस्तान की मरुभूमि में..
अंगारों सी तपती रेत...
सूर्य देवता का प्रचंड प्रकोप...
बदन से लिपटी लाल ओढनी…..
मुंह ढका हुआ...सिर्फ आंखें खुली...
एक कतार में चल पडी...
एक जैसी...दस-बारह पनिहारियां...
नंगे पांवों को तेज तेज बढाती...रेगिस्तान की मरुभूमि में....
नंगे पांवों को तेज तेज बढाती...
तेज धूप को भूलाने की खातिर,..
मधुर गीतों को गाती-गुनगुनाती...
सिर पर 'मोढ'मोतियों वाले...
उस पर पितल की चमकती गगरिया...
जाना है अब भी बहुत दूर्...रेगिस्तान की मरुभूमि में...
जल से ही तो जीवन है...
जीवन को बचाना,कर्तव्य ही तो है..
गंगा,जमना हो...या हो सरस्वती...
जल मिलता हो जहांसे...
जगह वही है,स्वर्ग समान....
आखिर पनिहारियों को मिला...
जलसे भरा भंडार...एक ताल..
सुस्ताई बेचारी कुछ देर वहां..
..जी भर कर जल्-पान किया...
आंचल गिला किया..मुख पर डाला!...
गगरियां भर ली..अपनी अपनी...रेगिस्तान की मरुभूमि में...
शहरवासी नहीं समझतें...
जल की बूंदों की कींमत्...
बहा देते है...बेतहाशा,..
नल खुल्ले छोड,
नालियों में बहाकर..या कारों को नहला कर्...
यही जल कितना है अनमोल..रेगिस्तान की मरुभूमि में...
बेचारी अबलाएं आज भी...
जल भरने जाती हर रोज्...
दूर..बहुत दूर्... तपती धूप हो या चलें सर्द हवाएं...
तेज आंधी या तूफान् भी हो राह में...
जल ले कर ही लौट आती.
ममतामयी नारियां…रेगिस्तान की मरुभूमि में...
चांद पर पहुंचे है हम..
शनि-मंगल भी है करीब...
विञान ने भी..की बहुतेरी तरक्की..
लेकिन..जल की समस्या,
दूर न हुई हमसे...
कब तक दूर से जल...ला,ला कर..
प्यास बुझाती रहेगी पनिहारियां?....रेगिस्तान की मरुभूमि में...
Posted by Aruna Kapoor at 12/10/2012 02:10:00 pm 0 comments
Thursday, 10 May 2012
अलविदा!...हम चल दिए...
....अलविदा!...हम चल दिए...
जाना तो है सभी को एक दिन...
तो हम क्यों न आज ही चल दें...
कहा-सुना- लिखा माफ हो दोस्तों...
आप यहाँ बने रहिए खुशी से...
हमें तो बस इजाजत ही दें....
खाली नहीं है झोली हमारी...
भरी हुई है सुन्दर यादें...
कुछ कमजोर क्षण...
कुछ हास्य के चटपटे व्यंजन..
कुछ जीवन से जुड़े तथ्य...
कुछ मन का सूना पन!
भावनाओं के सागर का खारापन...
शीतल मद-मस्त नदियों की मिठास....
और गैरों से मिला हुआ अपनापन...
सब कुछ बाँध लिया...
विचारों के दृढ़ बंधन में...
लिए जा रहे है संग अपने...
पोटली दिल से लगाए हुए...
पथ तो अब भी है शायद लंबा...
मौसम भी शायद है खुश-मिजाज...
पर हम?...दिल से है कुम्हलाएं हुए....
छोड़ कर जा रहे यादें अपनी...
रचनाओं के फूलों में पिरो कर...
फूल सूख भी जाएंगे तो क्या....
महक बनी रहेगी उम्र भर...
याद आना हंमेशा दोस्तों...
शुभकामनाएं हम दिए जा रहे...
नाम ऊँचा हो आप सबका....
सफलता कदम चुमती रहे,
समय ने अब पुकारा है हमें
...अलविदा!...हम जा रहे!
जाना तो है सभी को एक दिन...
तो हम क्यों न आज ही चल दें...
कहा-सुना- लिखा माफ हो दोस्तों...
आप यहाँ बने रहिए खुशी से...
हमें तो बस इजाजत ही दें....
खाली नहीं है झोली हमारी...
भरी हुई है सुन्दर यादें...
कुछ कमजोर क्षण...
कुछ हास्य के चटपटे व्यंजन..
कुछ जीवन से जुड़े तथ्य...
कुछ मन का सूना पन!
भावनाओं के सागर का खारापन...
शीतल मद-मस्त नदियों की मिठास....
और गैरों से मिला हुआ अपनापन...
सब कुछ बाँध लिया...
विचारों के दृढ़ बंधन में...
लिए जा रहे है संग अपने...
पोटली दिल से लगाए हुए...
पथ तो अब भी है शायद लंबा...
मौसम भी शायद है खुश-मिजाज...
पर हम?...दिल से है कुम्हलाएं हुए....
छोड़ कर जा रहे यादें अपनी...
रचनाओं के फूलों में पिरो कर...
फूल सूख भी जाएंगे तो क्या....
महक बनी रहेगी उम्र भर...
याद आना हंमेशा दोस्तों...
शुभकामनाएं हम दिए जा रहे...
नाम ऊँचा हो आप सबका....
सफलता कदम चुमती रहे,
समय ने अब पुकारा है हमें
...अलविदा!...हम जा रहे!
Posted by Aruna Kapoor at 5/10/2012 03:14:00 pm 18 comments
Friday, 4 May 2012
आई है...एक खुश खबर
है!.....कुछ नए-पन की तलाश!
नहीं है कोई नया विचार...
सामने रखने के लिए मेरे पास!
सब कुछ पुराना है..जाना पहचाना है...
जो भी संजोया हुआ है...खास, खास!
रचनाएँ पढ़ रही हूँ...हर रोज...
जैसे बासी कढी को कोई दे रहा उबाल!
बासी खाना खा कर भर रहा है पेट...
तो नया पकवान बनानेका क्यों उठाए जंजाल!
चलिए...अपनी मरजी का हर कोई मालिक...
नुक्ताचीनी करने का हमें क्या है हक?
किसी को ये करो...ये न करो क्यों कहें...
अपनी पहुँच है सिर्फ अपने तक!
फिरभी आशा है कुछ नए फूलों के खिलने की...
जो ताजगी दे...प्रेरणा दें...दे खुशहाल महक!
जैसे कर रहा है विज्ञान तरक्की...
क्या साहित्य नहीं ले सकता सबक?
साहित्यिक किसी और दुनियासे आए नहीं है....
वह रहते..विचरतें है...हमारे बीच,यहीं पर!
रचना का कुछ नया पकवान हरदम...
बनाकर परोसतें है...डटें हुए है यहीं पर!
खुश खबर यही है कि 'परिकल्पना'....
बेताबी से ढूंढ रही है आज उन्हें!
उनकी कला की कद्र होगी यकीनन...
आदर,मान- सम्मान भी प्रदान होगा उन्हें!
वटवृक्ष और परिकल्पना के साथ... आप....इस लिंक द्वारा जुड सकतें है!...
http://urvija.parikalpnaa.com/2012/05/blog-post_03.html
Posted by Aruna Kapoor at 5/04/2012 02:55:00 pm 11 comments
Wednesday, 25 April 2012
क्या कहता कबीरा इस पर...
समझ कर भी ना-समझ है हम!
चाहता तो है मन...
बहुत कुछ कहना!
बिती बातों को....
बार बार दोहराना....
किसी से कुछ ले कर...
किसी को कुछ देना!
पर ये हुई सिर्फ....
अपने मन की बात....
किसी के मन में क्या समाया....
मेरी तरह ही...
हर कोई है अज्ञात!
गलतफहमियां अनगिनत....
जिनकी नहीं कोई औकात...
फिर भी उन्हें दिल से निकालना...
है सभी के लिए....बहुत बड़ी बात!
प्रेम रस से है भरपूर...
हर दिल का...हर कोना...
इस बात को समझता है...
हर कोई सयाना...
पर हर किसी पर उसे लुटाना...
चाहेगा क्या कोई दीवाना?
प्रेम की गंगा बहाने की बातें...
किताबों में रह गई है दब कर...
साधु-महात्माओं के....
प्रवचनों में सुनाई देती है अक्सर!
...पर सुन कर अनसुना करने की आदत....
जोर मार रही है हमारे अंदर....
...प्यारे है हमें झगड़े और क्लेश-कलह.....
नफरत और बदले की भावना!
कटु शब्दों की गर्म बौछारें.....
बड़ा ही अच्छा लगता है हमें....
मित्रों का पल भर में शत्रु बन जाना!
कुछ कहने पर....
देखा है हमने ऐसे सिर-फिरों को...
'मै ऐसा ही हूँ!' कहकर मुस्कुरातें हुए ...,
अपने अख्खडपन पर गर्व करतें हुए ,
बड़े ठाठ से इधर-उधर इतरातें हुए !
क्या कृष्ण....क्या राम...
क्या हर हर भोले...
क्या जय श्री भगवान!
नजर आ रहा है हर कोई....
'नाम' दिन-रात इन्हीका जपता...
क्या कहता कबीरा इस पर....
काश!...कि आज वह ज़िंदा होता!
नोट...यह हमारे समाज की छबी है!...इसे कृपया व्यक्तिगत ना लिया जाए!
उपन्यास के उन्नीसवे पन्ने का लिंक दिया जा रहा है!
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/mujhekuchhkehnahai/entry/19-%E0%A4%95-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%9C-%E0%A4%AC%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%88-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%A8-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8-%E0%A4%AF-%E0%A4%B8
Posted by Aruna Kapoor at 4/25/2012 06:17:00 pm 18 comments
Monday, 23 April 2012
खुद अपने आप से है बेखबर...हमलोग!
काश!..अपनी भी खबर लें...हमलोग!
हंमेशा दूसरों की खोज खबर लेने में....
लिप्त रहते है हम लोग....
उसने क्या पहना, क्या खाया..
वह कहाँ गया...कब आया...
उसने ये कहा...उसने ये किया....
सब जानकारी रखतें है हमलोग!
वह बहुत अच्छा है....मिलनसार है....
कमाल का व्यक्तित्व है उसका....
हंमेशा मदद करता आया है वह...और
उसकी प्रशंसा के बड़े बड़े पूल....
खुश हो कर बांध देते है हम लोग....
लेकिन भूल जाते है हरदम....
अपने गुणों को जानना....
अपने प्रशंसनीय कार्यों को पहचानना....
अपनी खुद की पीठ थपथपाना....
ऐसा क्यों करते है हम लोग?
उपहार देते है हम दूसरों को....
दूसरे भी देते है हमें....
लेकिन कभी..अपने आप से खुश हो कर...
अपने आप को सुन्दरसा उपहार....
क्यों नहीं देते हम लोग?
कुदरत ने बनाई है सुन्दर चीजें....
उनमें से मैं भी हूँ एक...
मदद मैंने भी की है बहुतोंकी...कईबार...
मैं भी हूँ भला, साफ़ दिल का और नेक...
...पर अपने पर दो मीठे शब्द.....
..कहाँ खर्च करते है हमलोग!
दूसरों की पसंद- नापसंद की चिंता...
दूसरों की सेहत का भारी ख़याल...
दूसरों की दुनिया बसाने का सपना...
दूसरों को खुश रखने की दिली ख्वाहिश..
क्या सिर्फ दूसरों के लिए जी रहे है हमलोग?
अपने लिए भी...कुछ कर गुजरना....
बेशक फर्ज है हमारा....
अपने मन को खुश रखना...
अपनी सेहत का ध्यान रखना...
अपने आप से प्यार करना...कर्तव्य है हमारा!
काश!.. इतनी सी बात अगर समझ सकें हमलोग!
हंमेशा दूसरों की खोज खबर लेने में....
लिप्त रहते है हम लोग....
उसने क्या पहना, क्या खाया..
वह कहाँ गया...कब आया...
उसने ये कहा...उसने ये किया....
सब जानकारी रखतें है हमलोग!
वह बहुत अच्छा है....मिलनसार है....
कमाल का व्यक्तित्व है उसका....
हंमेशा मदद करता आया है वह...और
उसकी प्रशंसा के बड़े बड़े पूल....
खुश हो कर बांध देते है हम लोग....
लेकिन भूल जाते है हरदम....
अपने गुणों को जानना....
अपने प्रशंसनीय कार्यों को पहचानना....
अपनी खुद की पीठ थपथपाना....
ऐसा क्यों करते है हम लोग?
उपहार देते है हम दूसरों को....
दूसरे भी देते है हमें....
लेकिन कभी..अपने आप से खुश हो कर...
अपने आप को सुन्दरसा उपहार....
क्यों नहीं देते हम लोग?
कुदरत ने बनाई है सुन्दर चीजें....
उनमें से मैं भी हूँ एक...
मदद मैंने भी की है बहुतोंकी...कईबार...
मैं भी हूँ भला, साफ़ दिल का और नेक...
...पर अपने पर दो मीठे शब्द.....
..कहाँ खर्च करते है हमलोग!
दूसरों की पसंद- नापसंद की चिंता...
दूसरों की सेहत का भारी ख़याल...
दूसरों की दुनिया बसाने का सपना...
दूसरों को खुश रखने की दिली ख्वाहिश..
क्या सिर्फ दूसरों के लिए जी रहे है हमलोग?
अपने लिए भी...कुछ कर गुजरना....
बेशक फर्ज है हमारा....
अपने मन को खुश रखना...
अपनी सेहत का ध्यान रखना...
अपने आप से प्यार करना...कर्तव्य है हमारा!
काश!.. इतनी सी बात अगर समझ सकें हमलोग!
Posted by Aruna Kapoor at 4/23/2012 11:19:00 am 20 comments
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