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Tuesday, 13 January 2009

क्यों न और थोडी हो, इंतजार परस्ती!

...तृप्ति का अहसास...

याद आती है,
घनधोर घटाएं मस्ती में मचलती
सर्द हवाओं के झोंकों संग झुमती....
इठलाती, बलखाती और....
बरसने को बेताब सी....

पल पल तरसाती...
मेरे प्यासे मन की प्यास पर्...
गरज कर बेबाक सी हंसती....
यह सोच कर मानो मुस्कराती....
कि.. अब बरसना तो है ही हमें..
क्यों न और थोडी हो,

....इंतजार परस्ती...
गडी हुई नजरें मेरी....
घटाओं के सीने से टकराती...
कुछ थपथपियों का दुलार ....
कुछ पारदर्शी वस्त्र पर टीकती...
मखमली स्पर्श की...

मात्र कल्पना से ही बेकाबू..
उनकी सांसों की डोर में

जा...बार बार अट्कती....
प्यास की चरम सीमा पर पहुंच कर्..
अचानक फिसल कर,
वापस अपनी जगह, आ जमती!


..अब सावन की घटाएं,
यारो!...मेरी नहीं...
किसी और की प्यास बुझा रही है।
बरसने का अंदेशा बेशक था यहां पर्..

पर जाके वे कहीं और बरस रही है!

वही सर्द हवा का झोंका दुश्मन बनकर,
छीन कर्,उडा ले गया काली घटाएं..
मिलन के सपनें, मिटाएं मेरे सारे...
पर्..अब क्या कहें यारो!
घटाओं को मेरे मन से क्या वास्ता।
उन्हें तो प्यास बुझाने में मिल रहा आनंद्...
वे जहाँ बरस रही है...बेशक..
तृप्ती का अहसास वहां भी ले रही है।

Thursday, 1 January 2009

हर कदम जलते रहे हंमेशा खुशियों के दीये

हर कदम जलतें रहे...हंमेशा खुशियों के दीये।


हां।...तो हुई थी दस्तक दरवाजे पर,
जाना हमने कि वही है वो....
इंतजार उसीका तो था हमें,
अब यकीनन आ गया है वो....



बस।... हमने लपक कर खोला...
अपने दिल का दरवाजा....
अपने बंद भेजे का दरवाजा...
अपनी बंद आखों का दरवाजा....
अपनी कुंठित सोच का दरवाजा....
अपने सीमित दायरे का दरवाजा....
और कई पुरानी यादों का दरवाजा.....


एक जानी पहचानी महक....
दरवाजे के खुलने पर,.. आई अंदर।
एक धुंधली सी आकृति मन की आंखों से...
देखी हमने..बडी ही थी सुंदर।
उसके थे बारह हाथ...भरे-पूरे..लहरातें..
मानों कोई लहरों से भरा, विशाल समंदर।
एक एक हाथ में एक एक उपहार का पुलिंदा....
आने वाला बडा ही था, पहुंचा हुआ...धुरंदर।


बारह हाथ थे उसके... बारह महीने,
नया साल सामने खडा था उपहार लिये...
जानते थे हम वह बंद लिफाफों में,
लाया है बहुत कुछ... जो है हमारे लिये...
उसमें कुछ खुशियां भी है, गम भी है,
कुछ न बोले हम... बस। उसके स्वागत में,
जलाएं हमने सिर्फ आंखों के दीए...
जनवरी- फरवरी-मार्च्......
हमने बारह उपहार, उसके हाथ से ले लिए...



अब नूतन वर्ष आ कर,
मुड गया है, वापस जाने के लिए...
बारह उपहार जब आत्मसात कर लेंगे हम्,
वह फिर आएगा... नये बारह हाथ में लिए हुए....
मुबारक हो सभी को,
उसके बारह् उपहार जो है आपके लिए...
मनोकामनाएं पूर्ण हो सभी की,
हर कदम जलतें रहे...हंमेशा खुशियों के दिए....


Tuesday, 23 December 2008

दस्तक दे रहा दरवाजे पर

दस्तक दे रहा दरवाजे पर.....


पहले धीमी थी आवाज ;


ध्यान गया न गया...


अपनेआप में मग्न थे हम....


सुनाई दिया न दिया...


सुंदर सपनों के सजीले महल,


मन के खुले आसमान में,


बनानें, मिटाने से कहाँ थी फुरसत?


और सुंदर, अति सुंदर की चाहत में,


हम ने मन का दरवाजा जो बंद किया...


फ़िर सुनाई दी दस्तक...


अब पहले से कुछ तेज आवाज


खलल पड़ रही थी अब हमारी मग्नता में,


शायद आवाज बंद होने का इन्तेजार भी था...


कि अचानक कुछ याद आया....


हाँ!.. आना तो था किसीने;


हर बार की तरह उसे याद था...


उसे याद था अपना कर्तव्य;


भुलक्कड़ तो हम भी नहीं थे खैर!


ज़रा से हडबडा गए तो क्या हुआ?


समझ गए है हम कौन है वो...


सपनों के सजीले महल बनाने में...


हिम्मत और प्रेरणा देने वह आया है....


"नूतन वर्ष' नाम है उसका ....


हम दरवाजा खोलने जा रहे है!


हर बार की तरह मुस्कुराते हुए...


हमारा साथ देने ही वह आया....


गुरु, सखा, आराध्य देव भी है वह...


इस बार अपने पिटारे में देखें,


हम सब के लिए, क्या क्या लेकर आया!




Tuesday, 2 December 2008

आतंकवाद को नेस्त नाबूद कर दो यार

आतंकवाद को नेस्त-नाबूद कर दो यार!

आज आग की लपटों में ही,

घिरे हुए है हम सभी...

एक ही जगह है ऐसी,

कमरा भी एक है.....

बंद है दरवाजें सभी,

काला धुँआ मुंह, आँख,नाक के अन्दर...

घुटतें दम से है परेशान ,फ़िर भी...

बाहर निकलने के लिए,

एक मत... एक राय नहीं है...

चाहतें तो है सभी बाहर निकलना,

पर अफसोस कि...

एक नही अनेक दरवाजों पर ,

कर रहे है प्रहार सभी....

काश कि मिलकर सभी,

एक ही दरवाजे को तोडे...

आपस में दिल कि कडियाँ जोडें...

तो बाहर निकल सकतें है, अब घड़ी!

एक मत और एक जुट होना,

जरुरी है ऐसे में... नहीं तो....

राख के ढेर में बदलते,

देर कितनी लग सकती है भला!

अब भी समय है बच निकलने का ...

हिंदू , मुस्लिम, इसाई वाले दरवाजों को छोड़ो...

हिन्दी, मराठी या तमिल कन्नड़ को भी छोड़ो....

भारतीय बनकर, वैमनस्य का कमजोर दारवाजा...

फ़ौरन तोडो... निकलो बाहर...

आतंकवाद की धधकती आग में,

जल जाने दो आतंकियों को....

तुम एक हो,..एक ही भारतमाता है तुम्हारी,

एकता में है कितनी ताकत,

दुनिया को फ़िर दिखादो...एक बार !

अंग्रेजों को मात दी थी तुमने...

अब वो घड़ी आ गई है कि,

आतंकवाद को नेस्त-नाबूद कर दो यार!

Wednesday, 26 November 2008

ग्रसित है हम हरदम किसी न किसी समस्यासे

तो...ग्रसित है हम हरदम,
किसी न किसी समस्यासे...

एक का समाधान होता है या नहीं होता तो,
दूसरी सामने आ कर खडी हो जाती है...अचानक्?
अचानक ही नहीं; कभी आने की खबर भी देती है,
कभी 'चैलेंज' का रुप धर कर्,
आमंत्रित मेहमान बनकर भी आती है.....

तो..ग्रसित है हम हरदम, किसी न किसी समस्यासे...

दम भरतें है हंमेशा हम, अपनी मजबूती का...
नारिएल की तरह्, उपर से मजबूत लेकिन्...
अंदर से खोखलापन लिए हुए....
जैसे तैसे हल निकाल भी लेते है लेकिन्...
कहां रुकता है उनका आना-जाना,
तो..ग्रसित है हम हरदम, किसी न किसी समस्यासे....

अकेले रहते हुए, समस्या है अकेलापन भी....
भीड में रहने पर चाहतें है अकेलापन.....
दोस्त भी समस्या उपहार में देते है कभी कभी....
धन की अधिकता भी तो समस्या है बडी....
खाली खिस्से तो उससे भी बडी समस्या है...
तो..ग्रसित है हम हरदम, किसी न किसी समस्यासे...

Wednesday, 19 November 2008

सुंदर शहर एक सपना

सुंदर शहर...एक सपना!


सुंदर, स्वच्छ राहों का जाल,
मनमोहक उजाले का मस्त आलम,
शोर भी था ऐसा कि ,लगता था कर्णप्रिय,
न धक्कामुक्की, न हादसों का भय...
घने पेड़ों की मस्त कतारें मनमोहिनी,
एक शहर ऐसा भी था....


चंचल हवाओं का बसेरा था जहाँ,
दम घुटना कहते है किसे,
जानता भी न था कोई जहाँ,
त्यौहार मिलकर मनाते थे लोग,
धर्मं एक था...मानवता नाम का जहाँ,
एक शहर ऐसा भी था....


सभी चीज वस्तुओं का बंटवारा,
सबके लिए समान ही था...
गरीब और अमीर के बीच का फांसला,
न के बराबर ही... उस शहर में था...
दगा-बाजी, मिलावट से सभी थे बेखबर,
एक शहर ऐसा भी था.....


खुली आँख तो पाया...
वह था एक सपनों शहर,
असल में तो सब था उलटा-पुलटा...
बम-धमाके, कर्णभेदी आवाजें,
घुटन, धर्म के नाम पर पाखण्ड....
ऐसा ही है ये शहर....
कहने की अब हिम्मत नहीं है कि....
एक शहर वैसा भी था...