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Tuesday, 2 December 2008

आतंकवाद को नेस्त नाबूद कर दो यार

आतंकवाद को नेस्त-नाबूद कर दो यार!

आज आग की लपटों में ही,

घिरे हुए है हम सभी...

एक ही जगह है ऐसी,

कमरा भी एक है.....

बंद है दरवाजें सभी,

काला धुँआ मुंह, आँख,नाक के अन्दर...

घुटतें दम से है परेशान ,फ़िर भी...

बाहर निकलने के लिए,

एक मत... एक राय नहीं है...

चाहतें तो है सभी बाहर निकलना,

पर अफसोस कि...

एक नही अनेक दरवाजों पर ,

कर रहे है प्रहार सभी....

काश कि मिलकर सभी,

एक ही दरवाजे को तोडे...

आपस में दिल कि कडियाँ जोडें...

तो बाहर निकल सकतें है, अब घड़ी!

एक मत और एक जुट होना,

जरुरी है ऐसे में... नहीं तो....

राख के ढेर में बदलते,

देर कितनी लग सकती है भला!

अब भी समय है बच निकलने का ...

हिंदू , मुस्लिम, इसाई वाले दरवाजों को छोड़ो...

हिन्दी, मराठी या तमिल कन्नड़ को भी छोड़ो....

भारतीय बनकर, वैमनस्य का कमजोर दारवाजा...

फ़ौरन तोडो... निकलो बाहर...

आतंकवाद की धधकती आग में,

जल जाने दो आतंकियों को....

तुम एक हो,..एक ही भारतमाता है तुम्हारी,

एकता में है कितनी ताकत,

दुनिया को फ़िर दिखादो...एक बार !

अंग्रेजों को मात दी थी तुमने...

अब वो घड़ी आ गई है कि,

आतंकवाद को नेस्त-नाबूद कर दो यार!

Wednesday, 26 November 2008

ग्रसित है हम हरदम किसी न किसी समस्यासे

तो...ग्रसित है हम हरदम,
किसी न किसी समस्यासे...

एक का समाधान होता है या नहीं होता तो,
दूसरी सामने आ कर खडी हो जाती है...अचानक्?
अचानक ही नहीं; कभी आने की खबर भी देती है,
कभी 'चैलेंज' का रुप धर कर्,
आमंत्रित मेहमान बनकर भी आती है.....

तो..ग्रसित है हम हरदम, किसी न किसी समस्यासे...

दम भरतें है हंमेशा हम, अपनी मजबूती का...
नारिएल की तरह्, उपर से मजबूत लेकिन्...
अंदर से खोखलापन लिए हुए....
जैसे तैसे हल निकाल भी लेते है लेकिन्...
कहां रुकता है उनका आना-जाना,
तो..ग्रसित है हम हरदम, किसी न किसी समस्यासे....

अकेले रहते हुए, समस्या है अकेलापन भी....
भीड में रहने पर चाहतें है अकेलापन.....
दोस्त भी समस्या उपहार में देते है कभी कभी....
धन की अधिकता भी तो समस्या है बडी....
खाली खिस्से तो उससे भी बडी समस्या है...
तो..ग्रसित है हम हरदम, किसी न किसी समस्यासे...

Wednesday, 19 November 2008

सुंदर शहर एक सपना

सुंदर शहर...एक सपना!


सुंदर, स्वच्छ राहों का जाल,
मनमोहक उजाले का मस्त आलम,
शोर भी था ऐसा कि ,लगता था कर्णप्रिय,
न धक्कामुक्की, न हादसों का भय...
घने पेड़ों की मस्त कतारें मनमोहिनी,
एक शहर ऐसा भी था....


चंचल हवाओं का बसेरा था जहाँ,
दम घुटना कहते है किसे,
जानता भी न था कोई जहाँ,
त्यौहार मिलकर मनाते थे लोग,
धर्मं एक था...मानवता नाम का जहाँ,
एक शहर ऐसा भी था....


सभी चीज वस्तुओं का बंटवारा,
सबके लिए समान ही था...
गरीब और अमीर के बीच का फांसला,
न के बराबर ही... उस शहर में था...
दगा-बाजी, मिलावट से सभी थे बेखबर,
एक शहर ऐसा भी था.....


खुली आँख तो पाया...
वह था एक सपनों शहर,
असल में तो सब था उलटा-पुलटा...
बम-धमाके, कर्णभेदी आवाजें,
घुटन, धर्म के नाम पर पाखण्ड....
ऐसा ही है ये शहर....
कहने की अब हिम्मत नहीं है कि....
एक शहर वैसा भी था...


Friday, 31 October 2008

एक ज्योत जलाई हमने भी तुमने भी

मिल कर हमने..एक ज्योत जलाई...

अमावस की अंधेरी-काली रात...
मिल भी नहीं रही थी...
नजरों से नजरें...
थरथराते होंठो की झलक...
सिर्फ़ दिलसे,
महसूस कर रहे थे...
हम भी; तुम भी!
उजाले की .....
एक लकीर की भी...चाहत नहीं थी;
न हमें...न तुम्हें.....

फ़िर भी आंखे तरस रही थी...
अंधेरे को चीरने के लिए...

कुछ होने जा रहा था...
कुछ रुकावटें... पुर -जोश...
आधा अधुरा ही कुछ हुआ जूं ही....
बैचैनी के बढ़ते आलम के बीच...
फंसे हुए थे...हम भी; तुम भी!





फिर जलाई तुमने...
माचिस की एक तीली...
हडबडा गए हम भी अचानक से...
एक कागज़ का तुडा-मुडा टुकड़ा...
सटाया हमने, उस जलती लौ से...
आग की एक लपट ...
फ़िर धुँआ धुँआ !
फ़िर सहम कर संभल गए.....
हम भी; तुम भी!


फ़िर होठों पर हलकी सी मुस्कान लिए...
उस पल...उम्र भर साथ निभाने की...
वो कसमें...तहे दिलसे...
देर तक खाते रहे.....
हम भी, तुम भी!

Friday, 10 October 2008

चला जाऊँगा मैं

S...चला जाऊँगा मैं...S

" सोच क्या रहे हो अब ओल्ड मैन?

अब मरना तो पड़ेगा ही तुम्हें!

बहुत जी लिए अब बाउजी ...

अब इस दुनिया से तो, जाना ही पड़ेगा तुम्हें!

अब जो कुछ है तुम्हारा...

सब हो कर रहेगा हमारा...

साइन कर दो इस स्युसाइड नोट पर ....

इतना तो करना ही पड़ेगा तुम्हें!

चलो, देर मत करो मेरे आका!

ये सामने पड़ी जहर की शीशी....

जल्दी से गटक कर, अभी इसी वक्त...

तत्काल दम तोड़ना है तुम्हें!

तुम्हारी धन-दौलत की चिंता...

अब हमारे हवाले कर दो फ़ौरन!

गोड का नाम लेना ही ठीक है....

अब जाते जाते तुम्हारे लिए! "

" यह तो बहुत अच्छा ही हुआ...

जाने के लिए , बिल्कुल तैयार हूँ मैं!

मेरे जाने का इंतजाम किया चिरंजीवी!

आज तो बहुत ही खुश हूँ मैं!

तुम्हें पढाया , लिखाया, खिलाया...

इन सब का मीठा फल पाया...

खुशी इतनी मिली है मुझे आज तो...

कि बिना जहर पीए ही दम तोड़ दूँ मैं!

..लेकिन अन्तिम इच्छा बाकी है मेरी...

अगर पुरी कर सको तो मेरे प्यारों!

सोने पे सुहागे का काम हो के रहेगा ...

...और ठंडक दिल में लिए जाऊँगा मैं!

जानते ही हो तुम मेरे दिल के टुकडो!

...कि शुगर की बिमारी से ग्रस्त हूँ मैं!

250 ग्राम बटर-स्कोच आइस-क्रीम....

जहर के बदले खिला दो तो...

तुम्हें दुवाएं दे कर... दम तोड़ दूंगा मैं!"

Saturday, 24 May 2008

आंसू बहा रहे है बार बार

आंसू बहा रहे है, बार-बार!


क्या सोचा तुमने कि ...
इस जहाँ से चले गए हम?
एक ऐसी जगह पहुँच गए कि...
वापसी ना होगी, इस जनम?
शक्ल हमारी ना देखोगी कभी...
...और रिश्ते भी हो गए ख़तम?

आमना सामना कैसे होगा भला...
जब राख बन चुके तुम्हारे सनम ?
बिना वक्त गंवाएं तुमने....
थाम भी लिया किसी और का दामन ?
...और मिटा डाला प्यार और दोस्तीका,
हमारा या अपना भरम?


लेकिन जो तुमने समझा था...
...तुम्हारी आंखों का धोखा था यार!
मेहरबानी उस उपरवाले की ...कि,
हम नहीं हुए, हादसे के शिकार!
मौत के मुंह से वापस लाया शायद,
हमें हमारा सच्चा प्यार!

...पर अब दुबारा मर गए हम...
जब कि ख़तम हुआ इंतजार!
दिल को तुम्हारी बेवफाई ने,
आज कर दिया, तार-तार!
अपने जिंदा रहने के ग़म में,
आज आंसू बहा रहे हम; बार-बार!